अभिज्ञान ऐप
पाठ्यक्रम: GS2/ शासन
संदर्भ
- केंद्रीय गृह मंत्री ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा विकसित अभिज्ञान ऐप का शुभारंभ किया।
परिचय
- यह ऐप राष्ट्रीय स्वचालित फिंगरप्रिंट पहचान प्रणाली (NAFIS) से जुड़ा हुआ है, जो आरोपितों, दोषसिद्ध व्यक्तियों तथा जेलों में बंद व्यक्तियों के फिंगरप्रिंट स्कैन को एक केंद्रीकृत मंच पर संग्रहीत करता है।
- फिंगरप्रिंट का मिलान NAFIS डेटाबेस से मात्र 35 सेकंड में किया जा सकता है।
- सड़कों पर नियमित वाहन जांच के दौरान किसी भी संदिग्ध व्यक्ति का बायोमेट्रिक स्कैन कर अपराधों से संबंधित वांछित व्यक्तियों की पहचान की जा सकती है।
विधिक चिंताएँ
- आपराधिक प्रक्रिया पहचान अधिनियम, 2022 इस प्रकार की जांचों के लिए कानूनी आधार प्रदान करता है।
- हालांकि, अधिनियम की धारा 3 के अनुसार फिंगरप्रिंट सहित अन्य पहचान संबंधी मापों का अनिवार्य अभिलेखन केवल—
- दोषसिद्ध व्यक्तियों,
- गिरफ्तार व्यक्तियों, तथा
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अंतर्गत सदाचार बनाए रखने अथवा शांति बनाए रखने हेतु सुरक्षा देने के आदेश प्राप्त व्यक्तियों तक सीमित है।
- अधिनियम में ऐसे व्यक्तियों के यादृच्छिक परीक्षण का कोई उल्लेख नहीं है जिनके विरुद्ध किसी दंडनीय अपराध से संबंधित कोई साक्ष्य उपलब्ध न हो।
स्रोत: TH
फुटपाथ पर चलने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है: सर्वोच्च न्यायालय
पाठ्यक्रम: GS2/ राजव्यवस्था एवं शासन
संदर्भ
- एक ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि सुरक्षित एवं स्पष्ट रूप से चिह्नित फुटपाथों पर चलने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।
परिचय
- पैदल चलने का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(d) के अंतर्गत प्रदत्त आवागमन की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से उत्पन्न होता है।
- न्यायालय के अनुसार, पैदल चलने का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(b) एवं 19(1)(c) के अंतर्गत प्रदत्त—
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,
- शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता, तथा
- संगठन/संघ बनाने की स्वतंत्रता को भी समर्थन प्रदान करता है।
- इस निर्णय के माध्यम से नगर निगमों, शहरी विकास प्राधिकरणों, नगरपालिकाओं तथा पंचायतों पर पैदल यात्री अवसंरचना के निर्माण, रखरखाव एवं संरक्षण का दायित्व निर्धारित किया गया है।
- न्यायालय ने बल दिया कि शहरी नियोजन में मोटर चालित वाहनों की अपेक्षा पैदल यात्रियों के अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- यदि नागरिकों को सुरक्षित एवं सुगम फुटपाथ उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं, तो वे न्यायिक उपायों का सहारा ले सकते हैं।
स्रोत: TH
ऊर्जा संक्रमण सूचकांक (ETI) 2026
पाठ्यक्रम: GS3/ ऊर्जा
संदर्भ
- ऊर्जा संक्रमण सूचकांक (ETI) 2026 के अनुसार, वर्ष 2025 में वैश्विक ऊर्जा निवेश 3.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने के बावजूद वैश्विक ऊर्जा संक्रमण की गति प्रभावी रूप से ठहर गई है।
ऊर्जा संक्रमण सूचकांक (ETI) के बारे में
- ऊर्जा संक्रमण सूचकांक (ETI) एक वार्षिक सूचकांक है, जिसे विश्व आर्थिक मंचद्वारा प्रकाशित किया जाता है।
- यह सूचकांक इस बात का आकलन करता है कि विभिन्न देश सुरक्षित, सतत, न्यायसंगत एवं किफायती ऊर्जा प्रणालियों की ओर कितनी प्रभावी ढंग से संक्रमण कर रहे हैं।
- मूल्यांकन के आधार : सूचकांक दो व्यापक आयामों पर आधारित है—
- प्रणाली प्रदर्शन :
- ऊर्जा सुरक्षा
- सततता
- समानता/न्यायसंगतता
- संक्रमण तत्परता:
- नीतियाँ एवं विनियम
- निवेश
- अवसंरचना
- नवाचार
- शिक्षा
- संस्थागत समर्थन
- प्रणाली प्रदर्शन :
- महत्त्व : यह सूचकांक सरकारों को ऊर्जा संक्रमण से संबंधित अपनी शक्तियों एवं कमजोरियों की पहचान करने तथा नीतिगत सुधारों के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करने में सहायता करता है।
ऊर्जा संक्रमण सूचकांक (ETI) 2026 के प्रमुख निष्कर्ष
- स्वीडन, फ़िनलैंड और डेनमार्क ने वैश्विक स्तर पर क्रमशः प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान बनाए रखा।
- भारत ने दो स्थानों की प्रगति करते हुए 70वाँ स्थान प्राप्त किया।

- विद्युतीकरण , शीतलन, डिजिटल अवसंरचना तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के कारण वैश्विक विद्युत मांग में 3% की वृद्धि हुई, जिसे ऊर्जा संक्रमण के समक्ष उभरती हुई प्रमुख बाधा के रूप में देखा गया।
- उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने ऊर्जा मांग में लगभग 80% वृद्धि का योगदान दिया, किंतु वे अभी भी उच्च वित्तीय लागत एवं अवसंरचनात्मक कमियों का सामना कर रही हैं।
- विश्व आर्थिक मंच (WEF) ने ऊर्जा संक्रमण को गति देने हेतु तीन प्रमुख प्राथमिकताओं की पहचान की है—
- ऊर्जा प्रणाली के डिज़ाइन में लचीलापन एवं सुरक्षा को समाहित करना।
- ग्रिड एवं अवसंरचना विकास में तेजी लाना।
- विशेषकर उभरते बाजारों में दीर्घकालिक निवेश को आकर्षित करने हेतु स्थिर नीतिगत वातावरण तैयार करना।
स्रोत: BT
वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (FATF)
पाठ्यक्रम: GS2/ अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ
संदर्भ
- वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (FATF) की पूर्ण बैठक ने संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल को संगठन का आगामी उपाध्यक्ष नियुक्त किया है।
परिचय
- यह प्रथम अवसर है जब भारत FATF के उपाध्यक्ष पद का दायित्व संभालेगा।
- विवेक अग्रवाल जुलाई 2026 से जून 2027 तक FATF के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करेंगे।
- FATF का उपाध्यक्ष, FATF पूर्ण बैठक द्वारा उसके सदस्य देशों में से निर्वाचित किया जाता है तथा संगठन के कार्यों के संचालन में अध्यक्ष की सहायता करता है।
वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (FATF)
- FATF वैश्विक स्तर पर धन शोधन तथा आतंकवाद के वित्तपोषण की निगरानी करने वाली प्रमुख संस्था है।
- यह एक अंतर-सरकारी संगठन है, जिसके 40 सदस्य हैं। भारत वर्ष 2010 में FATF का सदस्य बना था।
- यह संस्था धन शोधन एवं आतंकवादी वित्तपोषण के तरीकों का अध्ययन करती है, जोखिमों को कम करने हेतु वैश्विक मानकों को बढ़ावा देती है तथा यह मूल्यांकन करती है कि विभिन्न देश इन चुनौतियों से निपटने के लिए प्रभावी कदम उठा रहे हैं या नहीं।
- FATF के अध्यक्ष का कार्यकाल दो वर्ष का होता है तथा उपाध्यक्ष संगठन के उद्देश्यों को पूरा करने में अध्यक्ष की सहायता करता है।
FATF की ग्रे एवं ब्लैक सूची का आशय
- FATF उन देशों एवं क्षेत्रों की पहचान करता है जिनकी धन शोधन निरोधक एवं आतंकवादी वित्तपोषण निरोधक (AML/CFT) व्यवस्थाएँ कमजोर हैं।
- इसके लिए FATF प्रति वर्ष तीन बार (फरवरी, जून एवं अक्टूबर) दो सार्वजनिक दस्तावेज जारी करता है।
- ग्रे सूची : आधिकारिक रूप से इसे “अधिक निगरानी के अधीन क्षेत्राधिकार” कहा जाता है।
- इसमें वे देश शामिल होते हैं जिनकी AML/CFT व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण कमियाँ होती हैं, किंतु वे निर्धारित समय-सीमा के अंदर इन कमियों को दूर करने हेतु FATF के साथ सक्रिय रूप से कार्य कर रहे होते हैं।
- ग्रे सूची में शामिल देशों पर FATF द्वारा अतिरिक्त निगरानी रखी जाती है।
- जून 2026 तक इस सूची में 22 देश सम्मिलित हैं।
- ग्रे सूची में शामिल होने से आर्थिक एवं प्रतिष्ठागत प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं, जिससे विदेशी निवेश एवं अंतरराष्ट्रीय सहायता के प्रवाह पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- ब्लैक सूची : आधिकारिक रूप से इसे “कार्रवाई हेतु आह्वान के अधीन उच्च जोखिम वाले क्षेत्राधिकार ” कहा जाता है।
- इसमें वे देश शामिल होते हैं जिनकी AML/CFT व्यवस्थाओं में गंभीर रणनीतिक कमियाँ होती हैं।
- FATF अन्य देशों से ऐसे राष्ट्रों के साथ व्यवहार करते समय उन्नत सतर्कता अपनाने तथा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली की सुरक्षा हेतु प्रतिरोधात्मक उपाय लागू करने का आग्रह करता है।
- वर्तमान में ब्लैक सूची में निम्नलिखित तीन देश शामिल हैं—
- उत्तर कोरिया
- म्यांमार
- ईरान
स्रोत: FATF
हीटवेव के कारण सतह-स्तरीय ओज़ोन की सांद्रता में वृद्धि
पाठ्यक्रम: GS3/ पर्यावरण
संदर्भ
- भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर के एक अध्ययन के अनुसार, भारत में हीटवेव के कारण सतह-स्तरीय ओज़ोन के संपर्क में वृद्धि हुई, जिससे वर्ष 2024 में 26,500 से अधिक मृत्युएँ जुड़ी हो सकती हैं।
ओज़ोन क्या है?
- ओज़ोन (O₃) तीन ऑक्सीजन परमाणुओं से मिलकर बनी एक गैस है।
- यह पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल (समताप मंडल) तथा निचले वायुमंडल (क्षोभमंडल) दोनों में पाई जाती है।
- समताप मंडलीय ओज़ोन : यह लाभकारी होती है क्योंकि यह ओज़ोन परत का निर्माण करती है।
- ओज़ोन परत पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों से सुरक्षा प्रदान करती है।
- क्षोभमंडलीय ओज़ोन: यह एक हानिकारक वायु प्रदूषक तथा ग्रीनहाउस गैस है।
- इसका प्रत्यक्ष उत्सर्जन नहीं होता, बल्कि यह सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOₓ) तथा वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCs) के बीच होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं से बनती है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार ओज़ोन का अधिकतम सुरक्षित स्तर 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर (µg/m³) होना चाहिए, जिसे एक दिन के अंदर 8-घंटे के अधिकतम गतिशील औसत के रूप में मापा जाता है।

हीटवेव से ओज़ोन स्तर में वृद्धि के कारण
- हीटवेव के दौरान तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है तथा सूर्य का प्रकाश अधिक तीव्र होता है। ये परिस्थितियाँ NOₓ एवं VOCs जैसे प्रदूषकों की रासायनिक अभिक्रियाओं को तीव्र कर अधिक ओज़ोन उत्पन्न करती हैं।
- हीटवेव सामान्यतः शांत मौसम एवं कम पवन वेग के साथ आती है। इसके कारण प्रदूषक वातावरण में फैलने के बजाय धरातल के निकट ही फँसे रहते हैं।
- अत्यधिक गर्मी के दौरान शीतलन हेतु विद्युत की मांग बढ़ जाती है, जिससे जीवाश्म ईंधनों का अधिक दहन होता है और ओज़ोन-निर्माणकारी प्रदूषकों का उत्सर्जन बढ़ता है।
- हीटवेव समाप्त होने के बाद भी कुछ दिनों तक ओज़ोन का स्तर ऊँचा बना रहता है, जिससे वायु गुणवत्ता तथा मानव स्वास्थ्य प्रभावित होते हैं।
स्रोत: DTE
फसल उत्पादकता बढ़ाने हेतु स्मार्ट बीज लेपन प्रौद्योगिकी
पाठ्यक्रम: GS3/ कृषि
संदर्भ
- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत कार्यरत भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद ने बीजों की गुणवत्ता में सुधार हेतु स्मार्ट बीज लेपन प्रौद्योगिकी विकसित की है।
परिचय
- ICAR-IIOR द्वारा विकसित यह तकनीक जैव-अवक्रमणीय जैव-बहुलकीय पदार्थों का उपयोग करके बीजों के चारों ओर एक बहु-कार्यात्मक सुरक्षात्मक परत तैयार करती है।
- यह लेपन लाभकारी सूक्ष्मजीवों, पोषक तत्वों, सूक्ष्म पोषक तत्वों, फसल संरक्षण एजेंटों तथा पौध वृद्धि को प्रोत्साहित करने वाले यौगिकों के लिए एक वाहक प्रणाली के रूप में कार्य करता है।
- ये सभी तत्व सीधे बीज-मृदा संपर्क क्षेत्र तक पहुँचाए जाते हैं।
- यह सुरक्षात्मक सूक्ष्म-पर्यावरण निम्नलिखित लाभ प्रदान करता है—
- तीव्र अंकुरण,
- सशक्त पौध वृद्धि ,
- बेहतर जड़ विकास ,
- पर्यावरणीय तनावों के प्रति अधिक सहनशीलता।
- यह तकनीक विशेष रूप से वर्षा-आधारित कृषि के लिए अत्यंत उपयोगी है, जो भारत के कुल कृषि क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा है तथा विलंबित मानसून जैसी परिस्थितियों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील रहती है।
स्रोत: PIB
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संक्षिप्त समाचार 20-06-2026